कोलकाता के राष्ट्रीय पुस्तकालय में 19 जुलाई को खुले म्यूजियम ऑफ वर्ड की नौ दीर्घाएं भाषा की यात्रा दिखाती हैं—उसकी आवाज, लिपि और सुनाई जाने वाली कहानियों के जरिए।
मातृभाषा, मौखिक परंपरा और सार्वजनिक पुस्तकालय आंदोलन अलग विषय हैं। प्रस्तुति में सिंधु-सरस्वती के चिह्नों से पुनर्जीवित गुंजाला गोंडी लिपि तक का क्रम शामिल है। ध्वनि-दृश्य और इंटरैक्टिव स्थापनाएं भी हैं।
पहले चरण में बेलवेडियर भवन की पहली मंजिल पर लगभग 2,282 वर्गमीटर प्रदर्शनी खुली। बाकी दीर्घाएं प्रस्तावित हैं। उद्घाटन सूचना में सोमवार को बंद और अन्य दिन सुबह दस से शाम छह बजे तक खुलने का समय है।
इस परिसर की अपनी पुस्तकालय यात्रा पुरानी है। संस्कृति मंत्रालय की 2012–13 रिपोर्ट के अनुसार शुरुआत 1836 के कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी से हुई। उसकी पुस्तकों को 1891 में बने इंपीरियल लाइब्रेरी के संग्रह से जोड़ा गया। संयुक्त पुस्तकालय 30 जनवरी 1903 को मेटकाफ हॉल में जनता के लिए खुला; स्वतंत्रता के बाद उसका नाम राष्ट्रीय पुस्तकालय हुआ। यह संस्था महत्वपूर्ण मुद्रित सामग्री और पांडुलिपियों का संरक्षण भी करती है।
मुख्य बातें
- पहले चरण में नौ विषयगत दीर्घाएं खुलीं।
- बोली, लिपि और मौखिक परंपराएं प्रस्तुति का हिस्सा हैं।
- संग्रहालय राष्ट्रीय पुस्तकालय के बेलवेडियर भवन में है।
स्रोत और संदर्भ
- संस्कृति मंत्रालय / पत्र सूचना कार्यालय · India’s First Immersive Language Museum, Museum of Word, inaugurated at National Library Kolkata ↗19 जुलाई 2026
- संस्कृति मंत्रालय · Annual Report 2012–13 — National Library, section 4.2.1 ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।



